गाडरवारा क्षेत्र में “मौत की मछली”: विभाग की नाक के नीचे बेची जा रही प्रतिबंधित मांगुर मछली
गाडरवारा। गाडरवारा और आसपास के इलाकों के बाजारों में मौत बांट रही मांगुर मछली खुलेआम बिक रही है। कानूनन प्रतिबंध के बावजूद, स्थानीय बाजारों में इस जहरीली मछली की सप्लाई हो रही है और मत्स्य विभाग की निष्क्रियता से लोगों का स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों खतरे में हैं।
खुलेआम जहर की बिक्री — कानून की खुलेआम धज्जियाँ
सरकारी आदेशों और मत्स्य विभाग के निर्देशों के अनुसार भारतीय बाजारों में थाई मांगुर मछली की बिक्री, उत्पादन और परिवहन पूरी तरह प्रतिबंधित है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी इस मछली पर सख्त रोक लगाई है। इसके बावजूद गाडरवारा और चीचली व आसपास के बाजारों में मुनाफे के लालच में व्यापारियों द्वारा लाखों रुपये की सप्लाई जारी है।
हाल ही में प्रदेश के अन्य जिलों में प्रशासन ने छापेमारी कर सैकड़ों किलो प्रतिबंधित मांगुर की जब्ती की है, लेकिन गाडरवारा में यह अवैध व्यापार अब भी जारी है।
काली मछली — स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार मांगुर मछली का सेवन गंभीर बीमारियाँ जैसे कैंसर, लिवर और किडनी संबंधी रोग पैदा कर सकता है। इस मछली में भारी मात्रा में लेड, आयरन और जहरीले तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के अंगों को नुकसान पहुँचाते हैं। साथ ही यह जल स्रोतों में अन्य देशी प्रजातियों को मारकर जल पर्यावरण का संतुलन नष्ट कर देती है।
विभाग की लापरवाही या मिलीभगत?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद मत्स्य विभाग केवल औपचारिक जांच या चेतावनी देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देता है। कई बार छापेमारी में प्रतिबंधित मछली पकड़ी भी जाती है, लेकिन उसे नष्ट करने के बजाय बेच दी जाती है या मामला दबा दिया जाता है। अधिकारियों की यह उदासीनता तस्करों के हौसले और बुलंद कर रही है।
कानून है सख्त, कार्रवाई का इंतजार
सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मांगुर मछली का पालन, बिक्री या परिवहन करना अपराध है। पकड़े जाने पर भारी जुर्माना और जेल तक का प्रावधान है। मत्स्य विभाग की जिम्मेदारी है कि वह नियमित छापेमारी करे और जनता को जागरूक करे, लेकिन गाडरवारा क्षेत्र में ऐसा नहीं हो रहा है।
